तेल अवीव/जेरेसलम — मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच संभावित संझौता / वार्ता संकेतों के बीच इज़राइल के प्रधान मंत्री नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति पेचीदा होती जा रही है। अमेरिकी नेतृत्व की ओर से समझौते या वार्ता की संभावनाओं के संकेत मिलने से नेतन्याहू के सामने कई राजनीतिक और रणनीतिक चुनौतियाँ खड़ी हो गई हैं।
1. सुलह की संभावनाओं ने युद्ध रणनीति पर सवाल खड़े किए
अमेरिका‑ईरान के बीच किसी भी संभावित समझौते की शर्तों को लेकर नेतन्याहू ने पहले ही स्पष्ट किया था कि किसी भी समझौते में ईरान के परमाणु ढांचे को नष्ट करना आवश्यक है, और उन्होंने वार्ता‑प्रक्रिया पर संदेह जताया है। उनके अनुसार इस तरह का समझौता तब तक स्वीकार नहीं किया जा सकता जब तक यह इज़राइल की सुरक्षा चिंताओं को पूरा नहीं करता।
2. आंतरिक राजनीति पर असर
सुलह की संभावनाओं ने नेतन्याहू को घरेलू राजनीति में भी मुश्किलों में डाल दिया है। वार्ता या युद्ध को लेकर निरंतर तनाव का फायदा नहीं मिल रहा — हाल के चुनावी सर्वे दिखाते हैं कि उनकी पार्टी के लिए सियासी फायदा सीमित रहा है और लोकप्रियता में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई है। इसी वजह से नेतन्याहू को राज्य बजट पास करने और जल्दी चुनाव से बचने की रणनीति पर जोर देना पड़ा है, क्योंकि युद्ध के चलते इज़रायली जनता की अपेक्षाएँ पूरी नहीं हो रही हैं।
3. अंतरराष्ट्रीय दलों का रुख
जहाँ अमेरिका संभावित डिप्लोमैटिक समाधान की ओर इशारा कर रहा है, वहीं कई मध्य पूर्व के सहयोगी देशों का कहना है कि ईरान के साथ जल्द समाधान करना क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए जोखिम भरा हो सकता है। इससे अमेरिका‑इज़राइल के रणनीतिक सहयोग में भी तनाव पैदा हो रहा है, और नेतन्याहू को एक कठिन सामंजस्य स्थापित करना पड़ रहा है।
संक्षेप में: अमेरिका और ईरान के बीच संभावित सुलह के संकेत ने नेतन्याहू के लिए राजनीतिक और सैन्य रणनीति दोनों को चुनौती दे दी है। उन्हें न केवल इज़राइल के भीतर की राजनीति और सार्वजनिक राय को संभालना है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि किसी भी समझौते से इज़राइल की सुरक्षा और रणनीतिक हितों को ठेस न पहुँचे।

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